आ गया लब पे अफसाना-ए-आशिकी
अब किसी भी फसाने की परवाह नहीं
हम तो उनसे मोहब्बत किये जायेंगे
अब हमेम इस जमाने की परवाह नहीं
आज ऐ इश्क साया तेरा सर पे है
ताज कदमों में है तख्त ठोकर पे है
मिल गयी है हमें प्यार की दौलतें
अब किसी भी खजाने की परवाह नहीं
जिन्दगी में बहारें रहेंगीं सदा
हमने उल्फत के गुलशन में पा ली जगह
चाहे बिलजी गिरे या चलें आँधियाँ
अब हमें आशियाने की परवाह नहीं
बन्दगी कर रहे हैं मोहब्बत की हम
ये नहीं जन्नते क्या है दायर-ओ-हरम
झुक गयी है जमीं हुस्न के सामने
अब कहीं सर झुकाने की परवाह नहीं |