आ पलकों में आ, सपने सजाआ
बेहोश रातों की निंदिया चुरा
आ पलकों में आ ...
जिस रागिनी को भीगी हुई चांदनी गा रही है
मेरे धडकते दिल से उसी की सदा आ रही है
आ पलकों में आ ...
यह प्यास कैसी है आकर ये जलते सितारों से पूछ ले
बेचैनियाँ हर पल मचलती बहारों से पूछ ले
आ पलकों में आ ... |