ऐ इचक बिचक चुर्र
दिल उड़ा गया बाबू फुर्र
शुरु शुरु में प्यार कहेगा तू दिलबर मैं जानी
धीरे धीरे रोग बढ़ा तब याद आयेगी नानी
नज़र का तीर सीने में लगा, गया दिल चीर
मन उलझा उलझी दो अंखिया, हाय! अब क्यो हो तदबीर
ओय इचक बिचक ...
अभी से एक के दो दो तुमको देने लगे दिखाई
सचमुच दोनो एक बने तो फिर क्या होगा भाई?
बावरे नैन ना इन को नींद ना इन को चैन
देखत है अब बात किसी की ये पगले दिन रैन
ओय इचक बिचक ... |