आवारगी हमारी प्यारि-सी थी कभी जो
वही आज हमको रुलाने लगी है
जो भरती थी दिल में तरंगे हमेशा
वही आज दिल को जलाने लगी है
आवारगी हमारी
न कोई ग़म न गिला न कोई शुगह क निशान
पायी थी हर खुशी हर सुक़ूँ हमको था
नग़मे थे, बहारों के तरन्नुम हर कहीं
फिर भी क्यों हम भटका किये
यह तू ही बता, आवारगी, आवारगी
आवारगी हमारी ...
खामोशियाँ हैं हर तरफ़, तन्हाइयाँ हैं हर तरफ़
यादों के भँवर से अब कैसे निकलें
साथी न रहा कोई न कोई हमसफ़र
ज़िंदगी के सफ़ें पर लिखने को
है अब तो बस आवारगी, आवारगी
आवारगी हमारी ... |