(ख़ुर्शीद)
बदरिया ...
बदरिया बरस गई उस पार
लिये खड़ी है प्रीत डगरिया
जोगनिया इस पार
बदरिया बरस गई उस पार ...
गरजने लगे मेघ माई रे
नाच नचावे मोर
धीमी-धीमी चमके बिजरिया
शोर करे घन घोर
अब दुनिया गई पुकार
बदरिया बरस गई उस पार ...
(मुकेश)
भर सरोवर पंछी प्यासा
कैसे मन सम्झाऊँ
न दिल जाने न दिल माने
क्या बोलूँ क्या गाऊँ
टूटे बीना के तार
बदरिया बरस गई उस पार ...
(हमीदा)
कूक-कूक कर कूक कोयलिया
अपना पीया बुलाए
सोए दर्द जगा मत बैरन
याद किसीकी आए
मेरे सूने मन के द्वार
बदरिया बरस गई उस पार |