चाह भंवर तृष्णा
नींद आए न
शग्न है सम्वेधना नियंथ्राना
नींद आए न
धूल बन उडद जाए
और दिशा न पाये
चाह भंवर तृष्णा
नींद आए न
प्रशन बन होता खड़ा
काल का व्यवहार
क्रोध कम पद्द जाए
युक्थी न मिल पाये
चाह भंवर तृष्णा
नींद आए न
मन् हो शंकित सोचता
है कहाँ आधार
संतुलन खो जाए
मन् पिघलता जाए
चाह भंवर तृष्णा
नींद आए न |