कहने को जश्नेबहारा है, दिल ये देख के हैराँ है -२
फूल से खुशबू खफा खफा है गुलशन में
छुपा है कोई रंज फिज़ा की चिलमन में
सारे सहमे नज़ारे हैं, सोये सोये वक्त के धारे हैं
और दिल में खोई खोई सी बातें हैं
कहने को जश्नेबहारा है, दिल ये देख के हैराँ है
फूल से खुशबू खफा खफा है गुलशन में
छुपा है कोई रंज फिज़ा की चिलमन में
कैसे कहें क्या है सितम, सोचते हैं अब ये हम
कोई कैसे कहे वो हैं या नहीं हमारे
करते तो हैं साथ सफर फासले हैं फिर भी मगर
जैसे मिलते नहीं किसी दरिया के दो किनारे
पास हैं फिर भी पास नहीं हम को ये गम रास नहीं
शीशे की इक दीवार है जैसे दरमियाँ
सारे सहमे नज़ारे हैं, सोये सोये वक्त के धारे हैं
और दिल में खोई खोई सी बातें हैं
कहने को जश्नेबहारा है, दिल ये देख के हैराँ है
फूल से खुशबू खफा खफा है गुलशन में
छुपा है कोई रंज फिज़ा की चिलमन में
हमने जो था नगमा सुना, दिल ने था उसको चुना
ये दास्तान हमें वक्त ने कैसी सुनाई
हम जो अगर हैं ग़मगीन वो भी उधर खुश तो नहीं
मुलाकातों में है जैसे घुल सी गई तन्हाई
मिल के भी हम मिलते नहीं, खिलके भी गुल खिलते नहीं
आंखों में हैं बहारें दिल में खिज़ा
सारे सहमे नज़ारे हैं, सोये सोये वक्त के धारे हैं
और दिल में खोई खोई सी बातें हैं
कहने को जश्नेबहारा है, दिल ये देख के हैराँ है
फूल से खुशबू खफा खफा है गुलशन में
छुपा है कोई रंज फिज़ा की चिलमन में |